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कश्मकश

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ये कैसी कश्मकश है ऐ मेरे दोस्त बड़ी अजीब सी है ये कश्मकश ए मेरे दोस्त हम तो हमेशा एक तरफा वफा निभाते चले गए पर ये लोग है जो हमे बेवफाई दिखलाते गए झूठे वादे ,झूठे सपने, झूठी दुनिया का ये जंजाल है यहां तो चारो तरफ दूर दूर है फैला झूठ का मायाजाल है लोगों ने चेहरे पर लगाया है झूठ का मुखौटा  नही दिखाना चाहते है वो अपना असली चौखटा  अब तो यहां घुटन सी महसूस होती है ए मेरे दोस्त अब तो निकलना है यहां से बेहतर ए मेरे दोस्त।

नवरात्रि है नवदुर्गा मां

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हो रहा है प्रारम्भ नवरात्रि महोत्सव का है ये अवसर अनुभव का जगत जननी मां दुर्गा के नव रूप का  प्रथम दिन है मां शैलपुत्री का यह दिव्य चेतना का है दर्शन मां के स्वरूप का  द्वितीय दिन है मां ब्रह्मचारिणी का  है ये अनुभव मां के योगनी स्वरूप का तृतीय दिवस है मां चंद्रघंटा का देता है दर्शन यह हमे मां के सौम्य स्वरूप का चतुर्थ दिवस है मां कूष्माण्डा का है ये दर्शन मां के आदिशक्ति, प्राणशक्ति स्वरूप का  पंचम दिवस है मां स्कंदमाता का ये है अदभुत दर्शन मां के ज्ञानशक्ति ,कर्मशक्ति स्वरूप का षष्ठी दिन है मां कात्यायनी का है ये दर्शन मां के महिषासुरमर्दिनी स्वरूप का सातवा दिन है मां कालरात्रि का है यह दर्शन  मां के संहार रूपणी  स्वरूप का आंठवा दिवस है महाअष्टमी मां महागौरी का है ये आलौकिक दर्शन मां के करुणामयी, फलदायिनी स्वरूप का नवा दिवस है नवमी मां सिद्धिदात्री का है यह अनुपम दर्शन सम्पूर्णता का मां के सिद्धि  स्वरूप का

ये भी क्या दिन हैं

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आजकल है एकाकी परिवार का चलन नही है आजकल हममें  अपने रिश्तों को निभाने का चलन कर देते है अपनो रिश्तों को हम हमेशा के लिए दरकिनार  अब तो हमारी जरुरत  है  अपने लिए नए दोस्तो की दरकार  माता पिता को नही है फुरसत दफ्तर के काम से गुजरता बच्चो का बचपन है  घर पर नौकरों के भरोसे मां के लोरियो के जगह  मोबाइल फोन ने ले ली है मां की गोद की जगह  घर की आया ने संभाली है जब आते है लौट कर  माता पिता घर पर शाम को हो जाते  है व्यस्त वो  दोबारा अपने दफ्तर के काम से खो जाता है बच्चो का  बचपन हो जाता है खत्म उनके अंदर का  इमोशन नही होता है कोई उनका अपना  जिसके साथ बांटे वो अपना सपना धीरे धीरे समय बीतता जाता है  बच्चे बड़े हो जाते है अब वो स्कूल से निकल कर कॉलेज में पढ़ने जाते है हो जाते है अब वो अपने  कॉलेज में दोस्तो के साथ व्यस्त धीरे धीरे हो जाते है अब वो नए माहौल में अभ्यस्त  आ जाता है अब मां और पिता के  सेवा निवृत्त होने का समय और बच्चो के कॉलेज की पढ़ाई  पूर्ण कर नौकरी करने का समय अब वो आ जाते है घर पर  र...

वो भी क्या दिन थे

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वो भी क्या जमाना था जब एक ही घर में सब का ठिकाना था रहते थे सब साथ मिलाकर दादी दादा, चाची चाचा,  बुआ, टिंकू, चिंटू और सभी था घर छोटा उनका  पर दिल था सबका बड़ा  बनता था खाना सबका  एक ही लकड़ी वाले चूल्हे  या किरासन तेल से चलने वाले स्टोव पे और घर की सब औरतें थी  मिलकर बनाती बड़े चाव से उसको जिसमें था स्वाद प्रेम का  और थी मिठास अपनेपन की रात होते ही पहुंच जाते थे  सब बच्चे पास दादा दादी के  सुनने कहानियां पंचतंत्र ,  रामायण और महाभारत की  वो गांव या कस्बे के स्कूल में पढ़ने  पैदल या साइकिल से जाना कार्य न करने पर स्कूल अध्यापक की  डांट सुनना या मार खाना बच्चों के माता पिता का  उनसे शिकायत न करना  आपने हमारे बच्चे क्यों मारा था वो अध्यापक के प्रति उनका  अलग ही श्रद्धा और विश्वास दर्शाता था वो त्यौहारों के बीस पच्चीस दिन  पहले से उसकी तैयारियां करना सब लोगो का इस अवसर पर घर में इकट्ठा होना  और मिलकर बड़े उत्साह से त्यौहारों को  मनाना घर पर बने  विभिन्न प्रकार के  स्वादिष्ट प...

जिंदगी

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क्या हो रहा है ए जिंदगी ऐसा क्यों हो रहा है ए जिंदगी तुम क्यों इतने अजनबी से हो गए न जाने कब से  खफा खफा से हो गए ए जिंदगी ये बता दे तू मुझे  क्या है कमी मुझमें ये समझा दे तू मुझे हमने तो हर पल था दिया साथ तेरा क्यो चल दिए छोड़ के तुम मुझको अकेला ए जिंदगी ये बता दे तू मुझे  क्या है कमी मुझमें ये समझा  दे तू मुझे हमने तो चाहा था तुझमें ये जहां सारा तुमने तो कर दिया हमको इस जहां से बेसहारा ए जिंदगी ये बता दे तू मुझे  क्या है कमी मुझमें ये समझा दे तू मुझे

विश्वकर्मा महोत्सव

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है देव शिल्पी का जन्मोत्सव आज कहलाते है  पूरे विश्व में वो विश्वकर्मा महाराज है विष्णु पुराण में इनकी महत्ता का वर्णन प्रजापति ब्रह्मा के सातवे पुत्र के रूप में है इनका अदभुत प्रदर्शन जब की थी रचना सृष्टि की ब्रह्मा जी ने तब संपूर्ण सृष्टि के निर्माण की जिम्मेदारी थी संभाली विश्वकर्मा जी ने ये है सभी देवों के वास्तुकार और इंजीनियर था किया निमार्ण सभी देवों के अस्त्र शस्त्रों का समय समय पर आज होती है सर्वत्र कल  कारखानों में इनकी पूजा  जिससे होती है उन्नति और तरक्की कल कारखानों और सभी का

हिंदी दिवस

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आज है दिवस हिन्दी का   यह दिवस है अनेकता में एकता का था कहा गांधी जी ने १९१८ हिंदी साहित्य सम्मेलन में हिंदी है जनमानस की भाषा  यही होनी चाहिए हमारी राष्ट्रभाषा था संपूर्ण भारतवासी का एक सपना आजादी के बाद हो पूरे देश मे एक भाषा अपना किया गया था घोषित १४ सितंबर १९५९ में राष्ट्रभाषा हिन्दी को था उद्देश्य जुड़े सब लोग इस भाषा से  सम्पूर्ण देश के  दिया है योगदान देश के अनेक साहित्यकारों  ने जिनकी रचनाओं  ने हिंदी भाषा को पहुचाया घर घर में  आओ मिलकर ले संकल्प इस बात का है बनाना इस भाषा को प्रत्येक जनमानस का।