पंचामृत
*पंचामृत - धरती का जयघोष* *॥ मंगलाचरण ॥* वन्दे मातरं धरणीं, पंचतत्व समन्विताम्। जल वायु अग्नि भूमि व्योम, रक्षन्तु जगत त्रयम्॥ सीता राम हृदि ध्यायन्, धरा रक्षा व्रतं चरेत्। हरित भारत सिद्ध्यर्थं, कविता वाणीमुदीरयेत्॥ *॥ कविता ॥* धरा करे पुकार अति, सुनो सकल संसार। पंचतत्व रक्षा बिना, नहिं जीवन आधार॥ जल बिन सूना जगत है, जल ही प्राण समान। सरिता, सागर, सरवर को, दो निर्मल सम्मान॥ वायु बिन नहिं श्वास है, विष बुझाए प्राण। वृक्ष लगाओ घर-घर में, फैले हरित विधान॥ अग्नि सौर का रूप है, ऊर्जा दे अपार। पवन, सूरज संग मिले, मिटे अंधकार॥ गन करे आक्रोश अति, ताप बढ़े दिन-रात। जलवायु बदली देख के, काँपे जगत के गात॥ हिमगिरि रोए नित्य ही, पिघले हिम के माथ। प्रलय बुलाए आपदा, यदि न थामा हाथ॥ प्लास्टिक, विष, धुआँ तजो, माँ धरती को तारो। रीसाइकल का मंत्र जपो, कचरा कम निहारो॥ पंचामृत ये तत्व हैं, जल वायु अग्नि, भूमि, व्योम। इनकी रक्षा धर्म है, यही सनातन सोम॥ आज ...