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*चतुर्थ दिवस - माँ कूष्माण्डा वंदना*

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हे माँ कूष्माण्डा, हे चतुर्थ दिवस पूजनीय माँ, अद्भुत तेज है आपका, हे रोग विनाशिनी माँ। आपकी मुस्कान से ब्रह्माण्ड बना है, आपके तेज से ही सृष्टि सजा है, अष्टभुजा धारिणी, सिंह सवारी, सब रोगों को हरने वाली। हाथों में चक्र, गदा, कमल शोभित, अमृत कलश से करती रोग मोचित, मंद-मंद हँस कर सृष्टि रचाई, अपनी माया से दुनिया सजाई। आप ही हो आदि-शक्ति, अनादि माया, आपकी कृपा से ही चलती है काया, जो भी सच्चे मन से ध्याता, उसे आरोग्य और आयु मिल जाता। अनाहत चक्र की तुम स्वामिनी, सकल जगत की कल्याणकारिणी, हे माँ कूष्माण्डा कृपा कर जाना, हम भक्तों को निरोग कर जाना। *जय माँ कूष्माण्डा।*

*तृतीय दिवस - माँ चंद्रघंटा वंदना*

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हे माँ चंद्रघंटा, हे माँ जगत जननी, तृतीय दिवस है आपका, सौम्य रूप है आपका, मन को शीतलता देता, पर दुष्टों के लिए काल बन जाता। माथे पर अर्धचंद्र, घंटे सा सजता, उसकी ध्वनि से ही असुर दल काँपता, दस भुजाओं में शस्त्र सजे हैं, भक्तों के रक्षक बन खड़े हैं। सिंह पर सवार होकर आती हो, भक्तों के कष्टों को हर जाती हो, स्वर्ण सा दमके है रूप तुम्हारा, शांति और शक्ति का संगम प्यारा। घंटे की ध्वनि से शुद्धि आती, नकारात्मकता दूर हो जाती, जो तुम्हारा ध्यान लगाता, भयमुक्त जीवन वो पाता। हे माँ, मणिपुर चक्र की स्वामिनी, हम सबकी भाग्य विधामिनी, अपनी कृपा बरसा देना, हम सबके मन को शीतल कर देना। *जय माँ चंद्रघंटा।*

*द्वितीय दिवस - माँ ब्रह्मचारिणी वंदना*

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हे माता ब्रह्मचारिणी, द्वितीय स्वरूप धारिणी, शांत सौम्य स्वरूप है आपका, तप का तेज अनूप है आपका। एक हाथ में जप की माला, दूजे में कमंडल, रूप निराला, श्वेत वस्त्र धारिणी माता, भक्तों को ज्ञान सिखलाती माता। घोर तपस्या आपने की थी, शिव को पाने की जिद ली थी, हजारों वर्षों तक तप करके, प्रेम की परिभाषा लिख दी थी। त्याग और संयम की देवी, साधना की आप ही सेवी, जो भी आपको सच्चे मन से ध्याता, उसे सिद्धि और धैर्य मिल जाता। हम भी शीश झुकाते हैं, चरणों में ध्यान लगाते हैं, हे ब्रह्मचारिणी माँ कृपा कर जाना, भक्तों में तप का बल भर जाना। *जय माँ ब्रह्मचारिणी।*

*प्रथम दिवस - माँ शैलपुत्री वंदना*

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प्रारंभ है आज नवरात्रि पूजन का, नवदुर्गा के आराधना का। है प्रथम दिवस आज माँ शैलपुत्री का, अद्भुत है वर्णन उनके महिमा का। पर्वतराज हिमालय की पुत्री कहलाती, वृषभ पर सवार होकर आती। एक हाथ में त्रिशूल सुशोभित, दूजे में कमल, मन को मोहित। भाल पर अर्धचंद्र सजा है, माथे पर तेज अपार जड़ा है। शैल जैसी दृढ़ता सिखलाती, मन में स्थिरता वो भर जाती। जो भी सच्चे मन से ध्याता, मूलाधार का भेद वो पाता। जीवन में उसे स्थिरता मिलती, हर बाधा पल में ही टलती। आओ शीश झुकाएं, माँ को मनाएं, प्रथम पूजन से नववर्ष सजाएं। शैलपुत्री माँ आशीष दे जाना, भक्तों के मन को शक्ति से भर जाना। *जय माँ शैलपुत्री।*

"मैं लौट आया हूँ"*

वो कहते हैं, मैं हार गया हूँ, मैं कहता हूँ, मैं लौट आया हूँ। छोड़ कर गया था जो शोर में, मैं उसी खामोशी से लौट आया हूँ। मत पूछो, कहाँ था इतने दिन, मैं अपने ही भीतर, एक जंगल में था, जहाँ हर पेड़ मेरा ही डर था, हर पत्ता, मेरा ही वहम था, मैं उन पेड़ों को काट कर, लौट आया हूँ। मैंने अपनी हार को देखा है, बहुत करीब से, वो डरावनी नहीं थी, वो तो बस एक आईना थी, जो कह रही थी - "तू कोशिश ही कहाँ कर रहा था?" तो अब मैं आईना तोड़ कर नहीं, आईना बदल कर लौट आया हूँ। अब मुझे भीड़ में मत ढूंढो, मैं भीड़ से निकल कर, खुद को ढूंढ कर, लौट आया हूँ। ये मेरी जीत नहीं है दोस्तों, ये मेरी वापसी है, और वापसी हमेशा, जीत से बड़ी होती है।

"मेरे हिस्से का आसमान"

मुझे विरासत में महल नहीं चाहिए, मुझे मेरे हिस्से की धूप दे दो। मुझे सजा-सजाया रास्ता नहीं चाहिए, मुझे मेरे हिस्से की धूल दे दो। मैंने देखा है, पंख दिए जाते हैं, पर उड़ने को नहीं, सपने दिए जाते हैं, पर लड़ने को नहीं, तो अब... मैं खुद ही अपना आसमान बनाऊँगा, एक छोटा ही सही, पर मेरा होगा। यहाँ हर कोई कहता है - "बड़ा सोचो" कोई नहीं कहता - "सच सोचो" बड़ा तो गुब्बारा भी होता है, एक सुई में फूट जाता है, सच तो सुई जैसा होता है, छोटा, पर चुभता है, और याद रहता है। तो मैं बड़ा नहीं, सच्चा बनना चाहता हूँ, गिरूँगा, उठूँगा, फिर गिरूँगा, पर जो भी बनूँगा, अपने पसीने से बनूँगा। मुझे मत नापो मेरी जीत से, मुझे नापो मेरी उस रात से, जब सब सो गए थे, और मैं अकेला, अपने कल से लड़ रहा था।

मेरे कान्हा

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       मेरे कान्हा, मेरे मुरलीधर, मेरे माखनचोर, मेरे नंदकिशोर। तुमने ही तो प्रेम का संदेश दिया, जीवन को गीता का उपदेश दिया। कर्म के पथ पर चलना सिखाया, अधर्म से डटकर लड़ना सिखाया। आओ रे आओ,सारे आओ, कृष्ण जन्मोत्सव हम मनाएं। ढोल-मृदंग और बांसुरी संग, नंद के आनंद में झूम जाएं।