वो बचपन


वो भी क्या दिन थे ऐ यारों,
ना चिंता-बोझ सताती थी।
दोस्तों के संग बस मस्ती में,
स्कूल लंच संग भाती थी।।

वो होमवर्क ना करने पर,
टीचर की डांट बहुत खाना।
स्कूल खत्म हो जाने पर,
बस घर पर जल्द पहुंच जाना।।

गर्मी की छुट्टी मिलते ही,
यात्रा पर शीघ्र निकल जाना।
वापस आकर खट्टे-मीठे,
दोस्तों को हाल सुना जाना।।

वो अंतिम दिन था फेयरवेल का
शांत और मायूस थे हम।
चेहरे पर थी मुस्कान मगर,
अन्तर में था बिछुड़न का गम।।

समय का पहिया तीव्र गति से,
घूमा और वक्त बदलता गया।
सफल होने की चाहत में,
बस सबकुछ पीछे छूट गया।।

मंजिल पहुंच कर देखा तो,
खुद को पाया केवल तन्हा।
बस यादें शेष थीं दोस्तों की,
जो साथ गुजारे थे लम्हा।।

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