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श्री गणेश वंदना

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हे गजानन, हे गणपति, हे विनायक, हे बुद्धिपति, पिता शंकर देवाधिदेव, माता आदि शक्ति पार्वती। अग्रज हैं कार्तिकेय, जो देव सेनापति कहलाते, देवों में प्रथम पूज्य, तुमही सर्वत्र पूजे जाते। चार भुजा धारी तुम, मूषक वाहन तुम्हारा, मोदक है प्रिय भोग, लगता सबसे प्यारा। बड़ा है उदर तुम्हारा, उदारता का सार, संपूर्ण स्वीकार का, तुम हो रूप अपार। एक हाथ उठा है, जो रक्षा का प्रतीक, "घबराओ मत वत्स" कहते, देते अभय ठीक। दूजा हाथ झुका है, हथेली बाहर आई, अनंत दान का संकेत, विनम्रता सिखलाई, कहती यह मुद्रा - मिट्टी में मिलना एक दिन, इसलिए झुककर रहो, करो न कभी अभिमान। एक कर में अंकुश है, जागृत होने को कहते, दूजे कर में पाश है, नियंत्रण का भेद बताते। जागृति से ऊर्जा जागे, नियंत्रण जरूरी है, नहीं तो मन भटकेगा, यही तो दूरी है। गज-सा विशाल मस्तक, और वाहन छोटा चूहा, देख अचंभा लगे, पर है रहस्य गहरा। जैसे चूहा काट दे, बंधन की हर डोरी, वैसे ही ज्ञान तुम्हारा, काटे अज्ञान की हर डोरी। तुम हो एकदंत, एकाग्रता के स्वामी, ध्यान तुम्हारा सिखलाए, लक्ष्य एक ही थामी। हे गणपति, जब तम मिटे, ज्ञान का प्रकाश हो, तब हृदय मे...

*पितृ अमावस्या पर नमन*

      पितर कभी जाते नहीं... वे जाते नहीं, बस रूप बदल लेते हैं, हमारी साँसों में, धड़कन में ढल जाते हैं। वे आँगन की तुलसी में महकते हैं, देहरी के दीये में टिमटिमाते हैं। पुरानी हवेली की दीवारों में गूँजते हैं, बाबा की लाठी में, माँ के आँचल में बसते हैं।। पितर कभी जाते नहीं... वे दादी की कहानियों में लौट आते हैं, पिता की डाँट में, उनकी सीख में मिल जाते हैं। रसोई की खुशबू में, त्योहारों की रौनक में, वंश के हर नये जन्म में फिर से मुस्कुराते हैं।। पितर कभी जाते नहीं... वे हमारे ललाट की रेखाओं में लिखे हैं, हमारे स्वभाव में, हमारे संस्कारों में दिखे हैं। जब हम ठोकर खाकर संभल जाते हैं, समझो, किसी पुरखे का हाथ कंधे पर है।। पितर कभी जाते नहीं... वे पितृपक्ष में काग बनकर आते हैं, अमावस्या की रात तारों में चमक जाते हैं। हम श्रद्धा से जो जल अर्पित करते हैं, वे आशीर्वाद बनकर हम पर बरस जाते हैं।। आज सर्व पितृ मोक्ष अमावस्या पर, उन सभी पुरखों को शत-शत नमन, जिनके कारण हम हैं, जिनके आशीर्वाद से हम रहेंगे। 🙏 पितृ देवो भव 🙏