*पितृ अमावस्या पर नमन*

     


पितर कभी जाते नहीं...


वे जाते नहीं, बस रूप बदल लेते हैं,

हमारी साँसों में, धड़कन में ढल जाते हैं।


वे आँगन की तुलसी में महकते हैं,

देहरी के दीये में टिमटिमाते हैं।

पुरानी हवेली की दीवारों में गूँजते हैं,

बाबा की लाठी में, माँ के आँचल में बसते हैं।।


पितर कभी जाते नहीं...


वे दादी की कहानियों में लौट आते हैं,

पिता की डाँट में, उनकी सीख में मिल जाते हैं।

रसोई की खुशबू में, त्योहारों की रौनक में,

वंश के हर नये जन्म में फिर से मुस्कुराते हैं।।


पितर कभी जाते नहीं...


वे हमारे ललाट की रेखाओं में लिखे हैं,

हमारे स्वभाव में, हमारे संस्कारों में दिखे हैं।

जब हम ठोकर खाकर संभल जाते हैं,

समझो, किसी पुरखे का हाथ कंधे पर है।।


पितर कभी जाते नहीं...


वे पितृपक्ष में काग बनकर आते हैं,

अमावस्या की रात तारों में चमक जाते हैं।

हम श्रद्धा से जो जल अर्पित करते हैं,

वे आशीर्वाद बनकर हम पर बरस जाते हैं।।


आज सर्व पितृ मोक्ष अमावस्या पर,

उन सभी पुरखों को शत-शत नमन,

जिनके कारण हम हैं,

जिनके आशीर्वाद से हम रहेंगे।


🙏 पितृ देवो भव 🙏




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