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"मैं लौट आया हूँ"*

वो कहते हैं, मैं हार गया हूँ, मैं कहता हूँ, मैं लौट आया हूँ। छोड़ कर गया था जो शोर में, मैं उसी खामोशी से लौट आया हूँ। मत पूछो, कहाँ था इतने दिन, मैं अपने ही भीतर, एक जंगल में था, जहाँ हर पेड़ मेरा ही डर था, हर पत्ता, मेरा ही वहम था, मैं उन पेड़ों को काट कर, लौट आया हूँ। मैंने अपनी हार को देखा है, बहुत करीब से, वो डरावनी नहीं थी, वो तो बस एक आईना थी, जो कह रही थी - "तू कोशिश ही कहाँ कर रहा था?" तो अब मैं आईना तोड़ कर नहीं, आईना बदल कर लौट आया हूँ। अब मुझे भीड़ में मत ढूंढो, मैं भीड़ से निकल कर, खुद को ढूंढ कर, लौट आया हूँ। ये मेरी जीत नहीं है दोस्तों, ये मेरी वापसी है, और वापसी हमेशा, जीत से बड़ी होती है।

"मेरे हिस्से का आसमान"

मुझे विरासत में महल नहीं चाहिए, मुझे मेरे हिस्से की धूप दे दो। मुझे सजा-सजाया रास्ता नहीं चाहिए, मुझे मेरे हिस्से की धूल दे दो। मैंने देखा है, पंख दिए जाते हैं, पर उड़ने को नहीं, सपने दिए जाते हैं, पर लड़ने को नहीं, तो अब... मैं खुद ही अपना आसमान बनाऊँगा, एक छोटा ही सही, पर मेरा होगा। यहाँ हर कोई कहता है - "बड़ा सोचो" कोई नहीं कहता - "सच सोचो" बड़ा तो गुब्बारा भी होता है, एक सुई में फूट जाता है, सच तो सुई जैसा होता है, छोटा, पर चुभता है, और याद रहता है। तो मैं बड़ा नहीं, सच्चा बनना चाहता हूँ, गिरूँगा, उठूँगा, फिर गिरूँगा, पर जो भी बनूँगा, अपने पसीने से बनूँगा। मुझे मत नापो मेरी जीत से, मुझे नापो मेरी उस रात से, जब सब सो गए थे, और मैं अकेला, अपने कल से लड़ रहा था।

मेरे कान्हा

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       मेरे कान्हा, मेरे मुरलीधर, मेरे माखनचोर, मेरे नंदकिशोर। तुमने ही तो प्रेम का संदेश दिया, जीवन को गीता का उपदेश दिया। कर्म के पथ पर चलना सिखाया, अधर्म से डटकर लड़ना सिखाया। आओ रे आओ,सारे आओ, कृष्ण जन्मोत्सव हम मनाएं। ढोल-मृदंग और बांसुरी संग, नंद के आनंद में झूम जाएं।

श्री गणेश वंदना

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हे गजानन, हे गणपति, हे विनायक, हे बुद्धिपति, पिता शंकर देवाधिदेव, माता आदि शक्ति पार्वती। अग्रज हैं कार्तिकेय, जो देव सेनापति कहलाते, देवों में प्रथम पूज्य, तुमही सर्वत्र पूजे जाते। चार भुजा धारी तुम, मूषक वाहन तुम्हारा, मोदक है प्रिय भोग, लगता सबसे प्यारा। बड़ा है उदर तुम्हारा, उदारता का सार, संपूर्ण स्वीकार का, तुम हो रूप अपार। एक हाथ उठा है, जो रक्षा का प्रतीक, "घबराओ मत वत्स" कहते, देते अभय ठीक। दूजा हाथ झुका है, हथेली बाहर आई, अनंत दान का संकेत, विनम्रता सिखलाई, कहती यह मुद्रा - मिट्टी में मिलना एक दिन, इसलिए झुककर रहो, करो न कभी अभिमान। एक कर में अंकुश है, जागृत होने को कहते, दूजे कर में पाश है, नियंत्रण का भेद बताते। जागृति से ऊर्जा जागे, नियंत्रण जरूरी है, नहीं तो मन भटकेगा, यही तो दूरी है। गज-सा विशाल मस्तक, और वाहन छोटा चूहा, देख अचंभा लगे, पर है रहस्य गहरा। जैसे चूहा काट दे, बंधन की हर डोरी, वैसे ही ज्ञान तुम्हारा, काटे अज्ञान की हर डोरी। तुम हो एकदंत, एकाग्रता के स्वामी, ध्यान तुम्हारा सिखलाए, लक्ष्य एक ही थामी। हे गणपति, जब तम मिटे, ज्ञान का प्रकाश हो, तब हृदय मे...

*पितृ अमावस्या पर नमन*

      पितर कभी जाते नहीं... वे जाते नहीं, बस रूप बदल लेते हैं, हमारी साँसों में, धड़कन में ढल जाते हैं। वे आँगन की तुलसी में महकते हैं, देहरी के दीये में टिमटिमाते हैं। पुरानी हवेली की दीवारों में गूँजते हैं, बाबा की लाठी में, माँ के आँचल में बसते हैं।। पितर कभी जाते नहीं... वे दादी की कहानियों में लौट आते हैं, पिता की डाँट में, उनकी सीख में मिल जाते हैं। रसोई की खुशबू में, त्योहारों की रौनक में, वंश के हर नये जन्म में फिर से मुस्कुराते हैं।। पितर कभी जाते नहीं... वे हमारे ललाट की रेखाओं में लिखे हैं, हमारे स्वभाव में, हमारे संस्कारों में दिखे हैं। जब हम ठोकर खाकर संभल जाते हैं, समझो, किसी पुरखे का हाथ कंधे पर है।। पितर कभी जाते नहीं... वे पितृपक्ष में काग बनकर आते हैं, अमावस्या की रात तारों में चमक जाते हैं। हम श्रद्धा से जो जल अर्पित करते हैं, वे आशीर्वाद बनकर हम पर बरस जाते हैं।। आज सर्व पितृ मोक्ष अमावस्या पर, उन सभी पुरखों को शत-शत नमन, जिनके कारण हम हैं, जिनके आशीर्वाद से हम रहेंगे। 🙏 पितृ देवो भव 🙏

पंचामृत

*पंचामृत - धरती का जयघोष* *॥ मंगलाचरण ॥*   वन्दे मातरं धरणीं, पंचतत्व समन्विताम्।   जल वायु अग्नि भूमि व्योम, रक्षन्तु जगत त्रयम्॥   सीता राम हृदि ध्यायन्, धरा रक्षा व्रतं चरेत्।   हरित भारत सिद्ध्यर्थं, कविता वाणीमुदीरयेत्॥ *॥ कविता ॥*   धरा करे पुकार अति, सुनो सकल संसार।   पंचतत्व रक्षा बिना, नहिं जीवन आधार॥ जल बिन सूना जगत है, जल ही प्राण समान।   सरिता, सागर, सरवर को, दो निर्मल सम्मान॥ वायु बिन नहिं श्वास है, विष बुझाए प्राण।   वृक्ष लगाओ घर-घर में, फैले हरित विधान॥ अग्नि सौर का रूप है, ऊर्जा दे अपार।   पवन, सूरज संग मिले, मिटे अंधकार॥ गन करे आक्रोश अति, ताप बढ़े दिन-रात।   जलवायु बदली देख के, काँपे जगत के गात॥ हिमगिरि रोए नित्य ही, पिघले हिम के माथ।   प्रलय बुलाए आपदा, यदि न थामा हाथ॥ प्लास्टिक, विष, धुआँ तजो, माँ धरती को तारो।   रीसाइकल का मंत्र जपो, कचरा कम निहारो॥ पंचामृत ये तत्व हैं, जल वायु अग्नि, भूमि, व्योम।   इनकी रक्षा धर्म है, यही सनातन सोम॥ आज ...

पिताजी

उंगली पकड़कर जिन्होंने मुझे चलना सिखाया, गिरकर हर बार संभालना और उठना सिखाया। अपनी धूप छुपाकर जो मुझे छांव देते हैं, वो और कोई नहीं, मेरे पापा कहलाते हैं। ​अपनी खुशियों को भुलाकर मेरी हर ज़िद पूरी करते है कभी जताते नहीं, पर मेरे आंसुओं से उन्हें तकलीफ होती है। खुद के छाले छुपाकर जो मेरे तलवे सहलाए, वो पिता ही है, जो हर दर्द में भी मुस्कुराए। जिनके मजबूत कंधों पर बैठकर देखी मैंने दुनिया सारी, उनकी सादगी और डांट में भी छुपी है ममता न्यारी। ​जब भी कभी डगमगाए कदम या हौसला टूटा, उन्होंने हाथ थामकर कहा—"तू हिम्मत मत छोड़ना बेटा"। मेरी हर छोटी जीत पर जो सबसे ज्यादा मुस्कुराते हैं, वो पापा ही हैं, जो बिना कहे सब कुछ कर जाते हैं। उनकी आँखों के सपनो में है मेरी कामयाबी का घर, वो ढाल बनकर खड़े हैं, तो फिर मुझे किसका डर? ​वो घर की छत हैं, जो हर आंधी-तूफ़ान को सहती है, उनकी छत्रछाया में ही तो मेरी दुनिया सुरक्षित रहती है। आप सिर्फ मेरे पिता नहीं, मेरे  सबसे बड़े अभिमान हो, सच कहूं तो पापा, आप ही मेरी पूरी जान हो।